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Monday, December 21, 2020

ठेकेदारों को ब्लेकमेल कर वसूल रहें हैं पैसा...


अवैध वसूली से परेशान ठेकेदारों ने 50 भवन निर्माण कार्यों का काम किया बन्द।

गरियाबंद. शासन ने ग्रामीण क्षेत्रो में अधोसंरचना विकास व विभिन्न प्रकार के भवन निर्माण कार्यो के संचालन के लिए ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (आरईएस विभाग) को अधिकृत किया है। परन्तु आरईएस विभाग गरियाबंद के अधिकारी और इंजिनियर ग्रामीण क्षेत्रो के विकास को छोड़ अपने स्वयं के विकास व कमीशन का जरिया बना लिए है।आरईएस विभाग गरियाबंद के अधिकारी और इंजिनियर कदम कदम पर ठेकेदारों से पैसो की मांग करते है। और मजबूर ठेकेदारों से अवैध वसूली व लूटपाट करते है।आरईएस विभाग गरियाबंद के अधिकारी और इंजिनियर टेंडर के लिए पैसा मांगते है,फिर फाईल को आगे बढाने के लिए पैसा मांगते है,फिर मूल्यांकन करने के लिए पैसा मांगते हैं,फिर बिल बनाने के लिए पैसा मांगते है,फिर बिल का एंट्री करने के लिए पैसा मांगते है,फिर बिल का भुगतान करने के लिए पैसा मांगते है,इस प्रकार बात बात पर आरईएस विभाग गरियाबंद के अधिकारी और इंजिनियर ठेकेदारों से पैसा मांग कर करते है।अधिकारियों के इस प्रकार के अवैध वसूली से परेशान हो कर ठेकेदारों ने आरईएस विभाग गरियाबंद के 50 से जादा भवन निर्माण कार्यो में काम करना बंद कर दिया है।कल मंगलवार से ठेकेदार आरईएस विभाग गरियाबंद के खिलाफ धरना में बैठ रहे है।


आरईएस विभाग के अधिकारी “गैंग” की तर्ज पर कर रहें हैं कार्य

आरईएस विभाग के अधिकारी “गैंग” की तर्ज पर काम करते है।जिस ठेकेदार से पैसा वसूलना रहता है उस ठेकेदार के टेंडर में पाईंट ढूंढ कर आपत्ति पत्र तैयार करता है।फिर कार्यपालन अभियंता अपने हस्ताक्षर से आपत्ति पत्र जारी करता है,फिर एस.डी.ओ. और इंजिनियर आपत्ति पत्र का हवाला दे कर बिल बनाने से इनकार कर देते है और पैसा का डिमांड करते है।इस प्रकार चारो की मिलीभगत से ठेकेदारों को ब्लेकमेल कर पैसा की अवैध वसूली किया जाता है।


अधिकारियों की शिकायत नहीं करते है ठेकेदार

अधिकारियों की शिकायत करने से डरते है ठेकेदार,जिसका फायदा उठाते है अधिकारी सारे ठेकेदार मजबूर है वो लोग आरईएस विभाग गरियाबंद के अधिकारी और इंजिनियर की कही भी शिकायत नहीं कर सकते है क्योकि ठेकेदारों का लाखो रुपया भवन निर्माण कार्यो में फंसा हुआ रहता है,यदि कोई ठेकेदार आरईएस विभाग गरियाबंद के अधिकारी और इंजिनियर की शिकायत करता है तो वो ठेकेदारों के काम में कई प्रकार की अनावश्यक आपत्ती लगा कर ठेकेदारों का पैसा रोक देते है। सारे ठेकेदार पैसा देने के लिए मजबूर होते है,पैसा नहीं देने पर कुछ ना कुछ कारण बता कर ठेकेदारों के कामो में अड़चन पैदा कर दिया जाता है।इस डर के कारण सभी ठेकेदार चुपचाप आरईएस विभाग गरियाबंद के अधिकारी और इंजिनियर के अत्याचार को सहन करते है,इस प्रकार चुपचाप आरईएस विभाग गरियाबंद के अधिकारी और इंजिनियर के अत्याचार,अवैध वसूली से परेशान हो कर सभी ठेकेदारों ने आरईएस विभाग गरियाबंद 50 से भी जादा भवन निर्माण कार्यो में काम करना बंद कर दिया है,50 से भी जादा भवन निर्माण कार्य दो-तीन साल से बंद पड़ा हुआ है परन्तु कोई भी अधिकारी,शासन प्रशासन अधूरे भवन निर्माण कार्यो की सुध नहीं ले रहें है।

इन जगहों पर ठेकेदारों ने किया काम बन्द

आरईएस विभाग गरियाबंद के अधिकारियों के अवैध वसूली से परेशान हो कर सभी ठेकेदारों ने आरईएस विभाग गरियाबंद 50 से भी जादा भवन निर्माण कार्यो में काम करना बंद कर दिया है उन सभी भवन निर्माण कार्यो की सूचि निम्नानुसार है :- ग्राम पंचायत मदांगमुडा में दो आंगनबाडी भवन, ग्राम पंचायत गोधीयारी में दो आँगनबाड़ी भवन, ग्राम पंचायत चिखली में एक आंगनबाडी भवन, ग्राम पंचायत खरीपथरा में तीन आंगनबाडी भवन, पंचायत कोदोभाटा में एक आंगनबाडी भवन, पंचायत सरनाबहाल में तीन आंगनबाडी भवन और एक पी.डी.एस. गोदाम भवन , पंचायत धनोरा में तीन आंगनबाडी भवन, पंचायत उसरीजोर में एक आंगनबाडी भवन, पंचायत धरनीढोढा में दो आंगनबाडी भवन और एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत कान्ड़ेकेला में दो आँगनबाड़ी भवन, ग्राम पंचायत नयापारा में चार आँगनबाड़ी भवन, ग्राम पंचायत नयापारा में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत गोपालपुर में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत देहारगुडा में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत जाडापदर में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत मुडगेलमाल में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत मुडागाँव में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत गोलामाल में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत नयापारा में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत छैलडोंगरी में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत केकराजोर में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत सरनाबहाल में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत धरनीढोढा में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत ढोढर्रा में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत साल्हेभाटा में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत धोबनमाल में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत कोकडी में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन, ग्राम पंचायत अड़गडी में एक पी.डी.एस. गोदाम भवन तथा 16 नग उपस्वाथ्य केंद्र निर्माण कार्यो समेत 50 से भी जादा भवन निर्माण कार्यो में ठेकेदारों ने काम बंद कर दिया है।


समझे कार्यों का गणित

पैसे बचाने के चक्कर में कम लागत पर दे देते हैं काम,महीनों में खराब हो जाता है निर्माण कार्य1।

मानक दरों से कम खर्च पर निर्माण कराने से काम की गुणवत्ता खराब हो सकती है, आमतौर पर भले ही ऐसा माना जाता हो लेकिन सरकारी निर्माण विभाग इसे एक अवसर समझते रहे हैं। जिले में पिछले 5-7 सालों से चाहे पीडब्ल्यूडी,आरईएस और पीएमजीएसवाई जैसे विभाग तय रेट से 20 से 45 फीसदी तक कम पर (बिलो पर लेना) ठेका दे रहे हैं। ठेके की दर, काम पर खर्च, ठेकेदार की कमाई और कमीशनखोरी पर हमारे प्रतिनिधि ने पड़ताल की और विशेषज्ञों से बात की तो विभागों की प्रक्रिया पर ही सवाल उठते दिखे हैं।


बिलो पर काम लेना क्या है

जब भी सड़क,भवन,पुल,पुलिया या किसी भी सरकारी निर्माण के लिए ठेके जारी किए जाते हैं तो एक एसओआर होता है। एसओआर यानि शेड्यूल आफ रेट्स मतलब किसी भी निर्माण के लिए विशेषज्ञों द्वारा तय दरें। यह मान लीजिए एसओआर 100 रुपए है मतलब उक्त काम को 100 रुपए में किया जाना है। अब टेंडर जारी किया जाता है। ठेकेदार आवेदन देते हैं।अगर एसओआर निर्माण में लगने वाले मेटेरियल्स के की कीमत के अनुपात में सही होते हैं तो ठेकेदार 5 प्रतिशत एबव ( 105 रुपए में काम करने को राजी) या 5 फीसदी बिलो (95 रुपए में काम करने को राजी) पर टेंडर भरता है। विभाग उस ठेकेदार को काम देती है जो मापदंडों पर खरा उतरने के साथ ही न्यूनतम दर पर काम को तैयार होता है।मतलब एक ठेकेदार ने 5 फीसदी बिलो पर टेंडर भरा और दूसरे ने 10 फीसदी बिलो पर तो काम दूसरे ठेकेदार को मिलेगा,क्योंकि विभाग को लगता है कि यह ठेकेदार 90 रुपए में ही काम पूरा कर देगा।


जनता को इससे क्या

नियम और प्रक्रिया के चक्कर में भले ही विभाग या शासन बिलो पर ठेका दे देता है लेकिन इसका नुकसान जनता को होता है।कोई भी सड़क,भवन,पुल,पुलिया की मांग पर प्रस्ताव बनने में चार से पांच साल लगते हैं।इसकी प्रशासकीय स्वीकृति और ठेके की प्रक्रिया में लगभग दो साल लगते हैं। कोई भी काम पूरा होने में एक से तीन साल तक लगते हैं। विभाग उस काम पर जनता का पैसा खर्च करता है। अगर काम गुणवत्तापूर्ण न हो न केवल सरकार के पैसे बर्बाद होते हैं बल्कि जनता को परेशानी या असुविधा झेलनी पड़ती है। मानिए की गरियाबंद से छुरा की सड़क पर सरकार काम कराए और उसके बनने में 100 रुपए में सिर्फ 30 रुपए ही खर्च हों तो सड़क जल्दी खराब होगी। आप शोर मचाएंगे, आंदोलन करेंगे तो शायद उसे फिर से बनाया जाए लेकिन 3 से 5 सालों तक आपको जर्जर सड़क पर ही चलना पड़ेगा।


क्या कहते हैं एक्सपर्ट


शासन द्वारा स्वीकृति की गई राशि बाजार मूल्य पर आधारित होती है। वे सर्वे करने के बाद ही रेट फिक्स करते हैं। इससे कम रेट में काम करना घाटे का सौदा है। यदि कोई कम दाम में भी काम करने तैयार है, इसका मतलब वह क्वालिटी से समझौता कर रहा है।


फायदे के चक्कर में भूले जाते हैं गुणवत्ता


जारी किए गए टेंडर में कम रेट पर टेंडर भरने वाले ठेकेदारों को ही अहमियत दी जाती है। इससे शासन को फायदा होता है। निर्धारित दर से कम दर में काम करने ठेकेदार तैयार है,इससे शासन का पैसा बचता है। सिक्योरिटी और परफार्मेंस गारंटी को छोड़ दें तो,100 रुपए के काम को विभाग ने अव्यवहारिक तरीके से 55 रुपए पर करने को दिया। इन 55 रुपयों में भी 25 रुपए कमीशन और ठेकेदार की कमाई में चले गए। बचे हुए सिर्फ 30 रुपए से ठेकेदार वह काम करेगा जिसे 100 रुपयों में किया जाना था।


बिलो पर लिया तो क्या


विभाग सैद्धांतिक रूप से मानता है कि उसका काम कम पर हो रहा है तो नुकसान क्या है। विभाग के अधिकारियों का कहना होता है।इसके बावजूद जानकार मानते हैं कि बिलो पर काम देना व्यावहारिक तौर पर गलत है। जब किसी काम को 45 फीसदी कम लागत पर कराया जाए तो गुणवत्ता निश्चित तौर पर ही खराब होगी। ठेकेदार को काम चाहिए इसलिए मजबूरी में बिलो पर काम तो ले लेता है लेकिन उसकी क्षतिपूर्ति करने के लिए घटिया सामग्री का इस्तेमाल करता है या मानकों का पालन नहीं करता।बता दे कि आर्थिक मंदी और सरकार के पास फंड की कमी का असर निर्माण कार्य पर पड़ा है। वहीं बाजार में नकदी प्रवाह (कैश फ्लो) कम रहा है। जिले में पिछले 5-7सालों से ऐसी ही स्थिति बनी हुई है। ‌विभाग के अधिकारी और जिले के बड़े ठेकेदारों से मिली जानकारी के मुताबिक जिले में पिछले दो सालों में सरकारी विभागों द्वारा जारी ठेकों में 80 फीसद ठेके बिलो पर दिए गए हैं। इनमें भी ज्यादातर काम 20 से 45 फीसदी बिलो पर लिए गए हैं। मतलब सरकार कहती है कि इस काम को 100 रुपए में किया जाए और ठेकेदार कहता है कि वह इसे 80 से 55 रुपए में कर दूंगा।


05% सिक्योरिटी गारंटी (काम पूरा होने पर वापस मिल जाता है)


05% परफार्मेंस गारंटी ( काम पूर्णता के 3 साल बाद वापस मिलता है)अगर कोई ठेका 45% बिलो पर जाए तो काम पर कितना खर्च होता है

15% सभी देयकों को पूरा करने के बाद ठेकेदार का प्रॉफिट


05% आयकर, कमर्शियल टैक्स और श्रम कल्याण के नाम पर


10% विभाग के अधिकारी व बाबू का कमीशन


100 रुपए का काम 55 रुपए में लिया मतलब शुरुआत ही 45% खर्च से हुई

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